बिहार

बिहार में शराब की बिक्री शुरू होने का रास्ता साफ़, इस दिन से मिलने लगेगा

पटना. वर्ष 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी (Complete prohibition) लागू करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) ने साफ-साफ कहा था कि शराब पीने का शौक रखने वाले बिहार न आएं. तब कई आर्थिक विशेषज्ञों ने कहा था कि सीएम नीतीश बड़ी भूल कर रहे हैं. इससे 4000 करोड़ रुपए सालाना घाटा उठाना पड़ेगा. हालांकि मुख्यमंत्री अपने फैसले पर अडिग रहे, क्योंकि तब उन्हें कोरोना वायरस (COVID-19) और लॉकडाउन (Lockdown) जैसी स्थिति का आभास भी नहीं रहा होगा. अब जब लॉकडाउन से उत्पन्न आर्थिक तंगी से निपटने के लिए कई राज्यों ने शराब की बिक्री का सहारा लिया है. दिल्ली जैसे राज्य में तो 70 प्रतिशत तक वैट बढ़ा दिए हैं, तो क्या इस स्थिति में सीएम नीतीश को शराबबंदी हटाने या उसमें कुछ संशोधन के साथ लागू करने की पहल करनी चाहिए?

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

इस सवाल का जवाब जब हमने आर्थिक-सामाजिक मामलों के विशेषज्ञ प्रो. नवल किशोर चौधरी से पूछा तो उन्होंने कहा, ‘मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अनप्रेडिक्टेबल व्यक्ति हैं. उन्हें समझना एक तरह से नामुमकिन है. वे कब क्या फैैसला ले लेंगे इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है.’

बकौल नवल किशोर चौधरी, ‘ये इस बात से प्रमाणित होता है कि जब 2005 में नीतीश सत्ता में लौटे थे, तो उसके बाद उन्होंने गांव-गांव, गली-गली, शराब की दुकानें खुलवा दी थीं. ये फैसला भी बड़ा ही बेतुका था. पर तब उन्होंने राजस्व वृद्धि की दलील दी थी. तब वे भी सिर्फ पैसा-पैसा ही कर रहे थे और इसे बड़े पैमाने पर एक अभियान के तहत लागू किया गया था.’

प्रो. चौधरी कहते हैं कि वर्ष 2016 में जब प्रदेश में शराबबंदी कानून लाया गया तो उस समय नीतीश कुमार की सहयोगी रही आरजेडी के भीतरी विरोध के बावजूद उन्होंने इसे लागू कर दिया. हालांकि तब सामने से आकर आरजेडी ने भी सीएम नीतीश के फैसले का समर्थन किया था. शायद वे सामाजिक सरोकार से पीछे नहीं हटना चाहते थे.

सरकार के मंत्री की राय

शराबबंदी वापस लेने के बारे में जब हमने बिहार सरकार के एक मंत्री से पूछा कि जब अन्य राज्य सरकारें इसे लागू कर रही हैं और अच्छा-खासा राजस्व इकट्ठा कर रही हैं. क्या बिहार सरकार भी ऐसा सोच रही है कि शराबबंदी कानून में कुछ संशोधन किया जाए? मंत्री ने तो पहले कहा कि इस पर वे कुछ नहीं कह सकते हैं. बाद में उन्होंने साफ कह दिया कि इस पर अगर कोई बोलेंगे तो सिर्फ सीएम नीतीश ही बोलेंगे.

हालांकि प्रो. नवल किशोर चौधरी कहते हैं कि शराबबंदी का कानून को सिर्फ इकोनॉमी के नजरिये से देखना उचित नहीं है. इसका सोशल आस्पेक्ट भी है. प्रो. चौधरी ने कहा कि इसे इस संदर्भ में भी देखने की जरूरत है कि आज कोरोना लॉकडाउन में सारी फैक्ट्रियां बंद हो गईं तो प्रदूषण स्तर में बड़ी कमी आई.

यहां तक कि जालंधर से धौलागिरी की पहाड़ियां दिखने लगी हैं. यही बात बिहार में शराबबंदी कानून से जुड़ती है. बिहार में इस कारण क्राइम रेट कम हो गए. युवकों की आदतों में परिवर्तन आया और गरीब तबके की महिलाओं पर अत्याचार में कमी आई है. इसे सिर्फ रेवेन्यू गेन या रेवेन्यू लॉस से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.

कानून को लचीला बनाया जा सकता है!

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय इस बारे में कहते हैं कि यह सही है कि शराबबंदी कानून के लागू होने से कोषागार पर बोझ बढ़ा है. लेकिन यह एक अच्छी पहल बिहार सरकार ने की थी. हालांकि कई संदर्भों में सोचा जाए तो इस कानून में थोड़ा संशोधन कर इसे लचीला बनाया जा सकता है. लेकिन यह सरकार को सोचना होगा कि इसके दूरगामी क्या परिणाम हो सकते हैं.

रवि उपाध्याय कहते हैं कि अगर कानून थोड़ा लचीला होगा तो यह एक अच्छी पहल हो सकती है, इसमें कहीं कोई दो मत नहीं है. पर यह सरकार अपनी ओर से तय करेगी. जिस तरह से बिहार में संसाधन का अभाव है और अब बड़ा आर्थिक संकट आने वाला है, ऐसे में केंद्र सरकार के भरोसे ही बैठना कहां तक उचित रहेगा.

बकौल रवि उपाध्याय सरकार को अपना रेवेन्यू जेनरेट करना ही पड़ेगा. अगर इस कानून को लचीला बनाती है तो आर्थिक बोझ कुछ हद तक कम हो सकता है. यह रकम बिहार की जनता की बेहतरी के लिए खर्च कर सकती है. हालांकि सिर्फ यही विकल्प नहीं है. साथ ही अन्य सेक्टर जो हैं, उस पर भी गंभीरता से सोचना पड़ेगा.

समाजशास्त्री अजय कुमार झा कहते हैं कि शराबबंदी का समाजिक संदर्भ में बेहतरीन इम्पैक्ट है.  लंबे समय से ये झूठ फैलाया जाता है कि कि इससे इकोनॉमी को फायदा होता है . जो समाज के हित में नहीं है वैसी इकोनॉमी का क्या करना.

बकौल अजय कुमार झा अगर ऐसा ही है तो वेश्यावृत्ति और अन्य बुराइयों को भी लागू किया जाना चाहिए क्या? अफीम और ड्रग्स को भी लीगेलाइज कर देना चाहिए क्या? ये भी तो रेवेन्यू जेनरेट करते हैं, लेकिन इसका सोशल कॉस्ट कितना पे करते हैं.

अजय झा कहते हैं कि जब भी सरकार के पास पैसा आता है वह जनता से ही आता है, इसमें कोई नई बात नहीं है. शराब का जो एक्सपेंडीचर है, वह भी तो काफी बड़ा है. इससे बीमारियां होती हैं, अपराध होते हैं, इसके भी तो कॉस्ट होते हैं.

झा कहते हैं कि जब शराबबंदी लागू की गई थी तब इसका लॉस 3000 करोड़ से 4000 करोड़ रुपए कहा गया था. अब यह बढ़कर 8000 करोड़ हुआ होगा. लेकिन इसकी भरपाई हमें दूसरे विकल्पों के जरिये करनी चाहिए, न कि शराबबंदी कानून खत्म करके. मेरा तो मानना है कि इसे और भी सख्त किया जाना चाहिए और अभी जो चोरी छिपे शराब मिल जाती है, वह भी बैन हो.

Share This Post