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जरूरत में कटौती कर खरीदारी, जोर नहीं पकड़ रही दुकानदारी

समस्तीपुर । व्यवसाय चाहे छोटा हो या बड़ा, खुदरा हो या थोक। लोगों की भीड़ के बावजूद बेहाल है। लॉकडाउन के कारण आपूर्ति कम होने के कारण बाजार भाव गर्म है तो खरीदार भी कम हो गए हैं। जरूरत में भी कटौती कर लोग खरीदारी कर रहे हैं। कुल मिलाकर कारोबार में तेजी नहीं दिख रही है। दलसिंहसराय में गल्ला व्यवसायी संतोष सुरेका बताते हैं गल्ला व्यवसाय लॉकडाउन के दौरान और अनलॉक में भी एक जैसा है। थोड़ा बहुत प्रभाव थोक विक्रेताओं पर पड़ा है।

कपड़ा व्यवसायी विश्वनाथ मेहता बताते हैं कि लॉकडाउन के कारण व्यवसायी पूरी तरह टूट चुके हैं। छूट मिलने के बाद ग्राहक आ रहे। पर, वे सीमित संसाधनों की खरीद कर रहे। शादी-विवाह का समय लगभग खत्म हो गया है। प्रमुख पर्व-त्योहार निकल गए। सबसे बड़ी तो ईद निकल गई। बरसात में तो कारोबार यूं ही मंदा रहता है। बसों में सीट से अधिक होते हैं यात्री

रोसड़ा से पटना जाने वाली सुबह की लगभग बसों में सीट से अधिक यात्रियों को बैठाया जा रहा है। ज्यादातर यात्री बिना मास्क के यात्रा कर रहे। एक बस चालक ने बताया ज्यादतर यात्री स्थानीय होते हैं जो सिघिया से दलसिंहसराय उतरते हैं। कुछ सातनपुर तो कुछ मुसरीघरारी के होते हैं। पटना जानेवाले यात्री को सीट के हिसाब से ही बैठाया जाता है। सभी के लिए मास्क अनिवार्य है। प्रत्येक खेप पर बस को सैनिटाइज किया जाता है। हालांकि, यह दावा सिर्फ बातों में होता है। वास्तविक धरातल पर शायद ही दिखता है।

इधर, बाजार की स्थिति भी ऐसी है कि ग्राहक तो ग्राहक, दुकानदार तक मास्क का प्रयोग नहीं करते। इक्का-दुक्का को छोड़ दें तो कहीं किसी के पास सैनिटाइजर नहीं होता है। रेडिमेड कपड़ों के व्यवसायी धीरज उपाध्याय बताते हैं कि दुकान में आनेवाले ग्राहकों के लिए चाय-पान बंद कर मास्क और हैंड सैनिटाइजर पर खर्च कर रहे। अस्पताल जाने से परहेज कर रहे लोग

कोरोना से पूर्व जहां अस्पताल में हर दिन ओपीडी में तकरीबन 200 सौ मरीज इलाज के लिए रजिस्ट्रेशन कराते थे। वहीं, कोरोना के बीच लॉकडाउन और अनलॉक होने के बावजूद संख्या बहुत कम है। बहुत जरूरत नहीं है तो लोग दवा दुकान से पूछकर दवा लेकर काम चला रहे। जबकि, पहले सिरदर्द से लेकर पेट दर्द या खासी-बुखार पर भी लोग इलाज को लेकर अस्पताल पहुंच रहे थे। बॉक्स में लें

महीने का नहीं, सप्ताह का बन रहा बजट

दलसिंहसराय शहर की गृहिणी अनुपमा लाल बताती हैं कि पहले महीने का बजट बनता था, पर अब सप्ताह या पखवारे का बना रहे। बाजार की सूची में ऐसा कोई भी सामान नहीं होता जो गैर जरूरी है। मतलब, उसका कोई विकल्प है तो उसमें कटौती की जा रही। मसलन, पहले दिन के खाने में पापड़, चिप्स, नाश्ते में मैगी, पास्ता, ब्रेड-बटन आदि का इस्तेमाल होता था। फिलहाल, इन चीजों पर पाबंदी है। इनके बदले रोटी-सब्जी, सत्तू का घोल, दही-चूड़ा या घर में बने आलू के चिप्स का इस्तेमाल हो रहा। इसका फायदा है कि जंक फूड से मुक्ति मिल रही और घर का बना खाना मिल रहा। रेस्टोरेंट बेशक खुल गए, पर वहां जाकर खाने पर अतिरिक्त खर्च करना उचित नहीं। इसलिए, घर की छोटी-छोटी जरूरतों को कम कर बजट संतुलित किया जा रहा।

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