समस्तीपुर Town

बेरहम है वो शहर, नहीं जाएंगे दोबारा..

समस्तीपुर : आंखों में अब खौफ के साए नहीं..। अपनी धरती और सिर पर अपना आसमां है..। 34 दिनों की वो स्याह रातें काले पानी से कम नहीं थीं। रोग के भय से कांपते लोगों को पेट की आग तपिश दे रही थी। पर, सरजमीं पर लौटने की उम्मीद के साथ थमी हुईं सांसें फिर चलने लगीं। कुछ ऐसा ही मंजर शाहपुर पटोरी में मध्य विद्यालय जगदंबा स्थान के क्वारंटाइन सेंटर पर देखने को मिला। उस खौफनाक मंजर की दास्तान सुनाते-सुनाते कई लोगों की आंखें भर आईं। क्वारंटाइन किए गए दरबा के कुछ लोगों ने जब अपनी कहानी सुनाई तो रोंगटे खड़े हो गए। चेहरे पर निकली हुई हड्डी और धंसी हुईं आंखों में पुराने मंजर उतर आए। सीमेंट फैक्ट्री में करते थे काम

एक व्यक्ति ने बताया कि गांव के तीन अन्य लोगों के साथ छठ बाद राजस्थान की पाली सीमेंट फैक्ट्री में काम करने गया था। लेबर के रूप में नौ हजार हर महीने और ओवर टाइम का पैसा तय था। किराये पर एक कमरा लेकर तीनों रहने लगे। हमें होली में ही घर लौटना था, कितु, छुट्टी नहीं मिली। मन मसोसकर रह गए। होली बाद घर लौटने की योजना बना ही रहे थे कि 24 मार्च को एकाएक फैक्ट्री का काम बंद हो गया। मालिकों ने बताया कि लॉकडाउन हो गया है। हम लोगों को दो सप्ताह का बकाया पैसा दे दिया गया। फैक्ट्री बंद होने के बाद हम सभी कमरे में आ गए। घर की आíथक स्थिति ठीक न होने और होली में न जाने के कारण कुछ पैसे रखकर शेष घर भेज दिए। कंपनी ने नहीं सुनी बात

कंपनी से हम लोगों ने आरजू मिन्नत भी की कि किसी तरह बिहार पहुंचा दिया जाए, कितु उन लोगों ने यह कहकर मना कर दिया कि फिलहाल संभव नहीं। हमलोग इस आशा में बैठे रहे कि अब आवागमन शुरू होगा, कितु नहीं हो सका। 20 दिनों के बाद पैसे भी समाप्त हो गए। इसी बीच वहां से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर दो लोगों में कोरोना पॉजिटिव पाया गया। सारी सीमाएं सील कर दी गईं। पुलिस की सख्ती बढ़ा दी गई। हमलोगों के सामने आगे कुआं, पीछे खाई। अब न तो खाने को कुछ था और न ही घर लौटने का उपाय। जान का भय अलग से। 25 अप्रैल को हम लोगों ने चूड़ा खरीद लिया और एक सप्ताह तक गुड़ के साथ उसे खाकर प्राणों की रक्षा की। 30 अप्रैल को ट्रेन के बारे में मिली सूचना

30 अप्रैल को जब यह मालूम हुआ कि घर लौटने के लिए जयपुर से ट्रेन खुलने वाली है, तब मन में कुछ आशा जगी। इसी आशा के साथ हम तीनों वहां से दो बजे रात में ही पैदल चल दिए। लगभग डेढ़ दिन में हम लोग पैदल 60 किलोमीटर चलकर जोधपुर पहुंच गए। बीच में पुलिस की सख्ती से नजर भी बचानी पड़ रही थी। बाद में जोधपुर की पुलिस ने हमलोगों को पकड़ कर जांचोपरांत जयपुर जाने की व्यवस्था कर दिया। सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद दो मई की रात ट्रेन में बैठे। वहां से दानापुर तक पहुंचा दिया गया। इसके बाद बस से पटोरी लाया गया। सरजमीं पर पहुंचे तो जिदा होने का एहसास हुआ। अब चाहे जो हो, उस बेरहम शहर में नहीं जाएंगे..!

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