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कोरोना से जंग में बढ़ाएं पशुओं का सुरक्षा कवच

समस्तीपुर। कोरोना से जंग में पशुधन की उपेक्षा ठीक नहीं। उनका ध्यान भी उतना ही जरूरी, जितना अपना। तापमान बढ़ने और मौसम में बदलाव के साथ ही दुधारू पशुओं में कई बीमारियों का प्रकोप होने लगता है। लॉकडाउन अवधि में टीकाकारण अभियान पर भी असर पड़ा है। ऐसे में पशुओं के मौसमी बीमारियों से पीड़ित होने की आशंका बढ़ गई है। पशुओं को गर्मी के मौसम में गलाघोंटू, खुरपका-मुंहपका, लंगड़ी बुखार आदि बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण जरूर कराना चाहिए, जिससे वे आगे आनेवाली बरसात में इन बीमारियों से बच सकें।

मौसम धीरे-धीरे तल्ख होता जा रहा है। इसमें उतार चढ़ाव के साथ ही गर्मी तेज हो रही है। तीखी धूप व गर्मी से इंसान तो परेशान हैं ही, साथ में बेजुबान भी सांसत में हैं। उन पर भी हीटस्ट्रोक का खतरा साफ मंडराने लगा है। पशु चिकित्सक डॉ. संजय कुमार ने बताया कि मौजूदा समय में हो रही धूप पशुओं के लिए बेहद घातक है। अधिक देर तक धूप में छोड़ने से उनमें हीट स्ट्रोक की समस्या आती है। शीघ्र उपचार नहीं मिला तो पशुओं की मौत तक हो जाती है। इसके साथ ही दुग्ध उत्पादन भी प्रभावित होगा। हीट स्ट्रोक के लक्षण

सुबह नार्मल रहने वाले मवेशी के शरीर का तापमान दोपहर से शाम तक 104 से 106 डिग्री तक हो जाता है। शरीर का तापमान बढ़ने के साथ मुंह से लार भी आने लगता है। मवेशी खाना-पीना छोड़ देते हैं। पशु कमजोर होने लगते हैं। दुधारू मवेशी दूध कम कर देते हैं। क्या बरतें सावधानी :

पशुओं को छायादार स्थान पर रखें, धूप में चरने के लिए न छोड़ें।

धूप से लाने के बाद कुछ देर छाए में बांधे, तब पानी पिलाएं।

सुबह और शाम को सूर्यास्त के बाद नहलाने का प्रयास करें।

पशुशाला के ऊपर पुआल डालें, ताकि वह गर्म न हो। पशुशाला में अधिक न हों पशु

पशुओं की संख्या अधिक नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक पशु को उसकी आवश्यकता अनुसार पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। सामान्य व्यवस्था में गाय को चार से पांच एवं भैंस सात से आठ वर्गमीटर खुले स्थान बाड़े के रूप में प्रति पशु उपलब्ध होना चाहिए। नहलाने और पानी की हो व्यवस्था

पशुओं को नहलाने का उचित प्रबंध होना चाहिए। पशुओं के शरीर पर दिन में दो या तीन बार ठंडा पानी का छिड़काव करें। संभव हो तो तालाब में भैंसों को नहलाएं। प्रयोगों से यह साबित हुआ है कि दोपहर को पशुओं पर ठंडे पानी का छिड़काव उनके उत्पादन तथा प्रजनन क्षमता को बढ़ाने में सहायक होता है। पशुओं को पीने का ठंडा पानी उपलब्ध होना चाहिए। इसके लिए पानी की टंकी पर छाये की व्यवस्था अति आवश्यक होता है। इनके आहार में हरा चारा अधिक से अधिक मात्रा में उपलब्ध कराना चाहिए। रसोई का जूठन या बासी खाना न खिलाएं

पशुशाला के आसपास छायादार वृक्ष होना चाहिए। यह वृक्ष पशुओं को छाया के साथ ही उन्हें गर्म लू से भी बचाते हैं। पशुओं को नियमित रूप से खुरैरा करें। खाने-पीने की नाद को नियमित अंतराल पर चूनाकली करना चाहिए। रसोई का जूठन तथा बासी खाना पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए। कार्बोहाइड्रेट की अधिकता वाले खाद्य पदार्थ जैसे आटा, रोटी, चावल आदि पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए। बचाव के लिए करें ये उपाय

फोटो फाइल नंबर : 24 एसएएम 06 : डॉ. संजय कुमार

सीधे तेज धूप एवं लू से नवजात पशुओं को बचाने के लिए पशु आवास के सामने की ओर खस या जूट के बोरे का पर्दा लटका देना चाहिए। आवास साफ-सुथरा तथा हवादार होना चाहिए। फर्श पक्का तथा फिसलन रहित हो। उसमें मूत्र और पानी की निकासी के लिए ढलान हो। पशुशाला की छत ऊष्मा की कुचालक हो, जिससे गर्मी में अत्यधिक गर्म न हो। इसके लिए एस्बेस्टस शीट उपयोग करना चाहिए। अधिक गर्मी के दिन में छत पर चार से छह इंच मोटी घास-फूस की परत या छप्पर डाल देना चाहिए। ये परत ऊष्मा अवशोषक का काम करती हैं। इससे पशुशाला के अंदर का तापमान मेंटेन रहता है। पशुशाला की छत की ऊंचाई कम से कम 10 फीट होनी चाहिए जिससे हवा का समुचित संचार पशुशाला में हो सके। पशुशाला की खिड़कियां, दरवाजे तथा अन्य खुली जगहों पर जहां से तेज गरम हवा आती हो बोरी या टाट आदि टांगकर पानी का छिड़काव कर देना चाहिए।

डॉ. संजय कुमार

भ्रमणशील पशु चिकित्सा पदाधिकारी।

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